
कार्तिक पूर्णिमा 2025: शुभ मुहूर्त, महत्व व इतिहास Kartik Purnima 2025: (Shubh Muhurat, Mahatva aur Itihas): हिंदू धर्म में कार्तिक पूर्णिमा (Kartik Purnima) एक अत्यंत शुभ और पवित्र पर्व माना जाता है। यह पर्व न केवल धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह स्नान, व्रत, दान और दीपदान की महान परंपरा से भी जुड़ा हुआ है। क्या आप जानते हैं कि कार्तिक पूर्णिमा का पौराणिक महत्व क्या है? इस दिन भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा क्यों की जाती है, और यह दिन मोक्ष प्राप्ति के लिए इतना शुभ क्यों माना गया है? यदि आप कार्तिक पूर्णिमा 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त के बारे में जानना चाहते हैं, तो यह समझना आवश्यक है कि हिंदू पंचांग के अनुसार इसका निर्धारण कैसे किया जाता है।
इस दिन गंगा स्नान, दीपदान, और दान-पुण्य करने से जीवन में क्या लाभ होते हैं? क्या सही विधि से इस पर्व को मनाने से व्यक्ति के पापों का नाश होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है? यदि आप भी इस दिव्य अवसर पर पुण्य लाभ अर्जित करना चाहते हैं और अपने जीवन में सुख-समृद्धि एवं आध्यात्मिक शांति प्राप्त करना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक अवश्य पढ़ें।
इस लेख में हम आपको कार्तिक पूर्णिमा 2025 की सम्पूर्ण जानकारी देंगे—इसकी तिथि, शुभ मुहूर्त, पौराणिक महत्व और इस दिन किए जाने वाले धार्मिक कार्यों के बारे में विस्तार से बताएंगे……
कार्तिक पूर्णिमा क्या है? | Kartik Purnima Kya Hai?
कार्तिक पूर्णिमा (Kartik Purnima) हिंदू धर्म में अत्यंत पावन तिथि मानी जाती है, जिसे ‘त्रिपुरी पूर्णिमा’ और ‘देव दीपावली’ के नाम से भी जाना जाता है। यह कार्तिक माह की पूर्णिमा को आती है और धार्मिक व आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इस दिन भगवान विष्णु, शिव और तुलसी माता की पूजा का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि इस दिन देवता स्वर्ग से धरती पर आकर गंगा स्नान करते हैं, इसलिए गंगा, यमुना और अन्य पवित्र नदियों में स्नान व दान-पुण्य करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है। साथ ही, इसे भगवान शिव के त्रिपुरासुर राक्षस के वध की विजय तिथि भी माना जाता है। इस अवसर पर वाराणसी में विशेष दीपदान होता है, जिसे ‘देव दीपावली’ के रूप में मनाया जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा 2025 कब है? | Kartik Purnima 2025 Kab Hai?
कार्तिक पूर्णिमा 2025 (Kartik Purnima 2025) में 5 नवंबर को मनाई जाएगी। यह दिन विशेष धार्मिक महत्व रखता है, जिसमें लोग पवित्र नदियों में स्नान करते हैं और दान-पुण्य करते हैं। इस दिन भगवान शिव की पूजा का भी विशेष महत्व है।
कार्तिक पूर्णिमा 2025 का शुभ मुहूर्त क्या है? | Kartik Purnima 2025 Ka Shubh Muhurat Kya Hai?
S.NO | तिथि | समय |
1 | कार्तिक पूर्णिमा | 5 नवंबर (पूरा दिन) |
2 | कार्तिक पूर्णिमा प्रारंभ | 4 नवंबर रात्रि 10:36 बजे |
3 | कार्तिक पूर्णिमा समाप्त | 5 नवंबर शाम 6:48 बजे |
कार्तिक पूर्णिमा की पूजा विधि क्या है? | Kartik Purnima Ki Puja Vidhi Kya Hai?
- स्नान और संकल्प: कार्तिक पूर्णिमा (Kartik Purnima) के दिन ब्रह्ममुहूर्त में पवित्र नदियों, कुंडों या घर में गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करें। स्नान के बाद व्रत का संकल्प लें और भगवान विष्णु एवं शिव की पूजा का संकल्प करें।
- दीपदान: संध्या के समय नदी, तालाब, कुएं या घर में दीपदान करें। विशेष रूप से तुलसी के समीप दीप जलाने से पुण्य प्राप्त होता है। दीपदान से पितरों की तृप्ति होती है और सौभाग्य की वृद्धि होती है।
- भगवान विष्णु और शिव की पूजा: इस दिन भगवान विष्णु और शिव की विशेष पूजा करें। जल, फल, फूल, धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित करें। श्री हरि के प्रिय मंत्रों का जाप करें और शिवलिंग का जलाभिषेक करें।
- दान-पुण्य: इस दिन जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र, धन, तिल, गुड़, घी और दीप दान करें। गौ, ब्राह्मण और साधुओं को दान देना विशेष फलदायी माना जाता है। इससे पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- सत्संग और कथा श्रवण: कार्तिक पूर्णिमा पर सत्यनारायण कथा, शिव पुराण या विष्णु पुराण का पाठ और श्रवण करें। धार्मिक सत्संग में भाग लें, जिससे आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है।
- व्रत एवं उपवास: श्रद्धालु इस दिन उपवास रखते हैं और केवल फलाहार करते हैं। कुछ लोग निर्जला व्रत भी रखते हैं। यह व्रत पापों से मुक्ति दिलाता है और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
- गंगा स्नान और तीर्थ यात्रा: कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं। तीर्थ स्थानों पर जाकर पूजा-पाठ करने और भजन-कीर्तन करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
कार्तिक पूर्णिमा की कथा क्या है? | Kartik Purnima Ki Katha Kya Hai?
भगवान शिव और त्रिपुरासुर वध की पौराणिक कथा
प्राचीन काल में एक अत्यंत शक्तिशाली असुर तारकासुर था, जिसने अपनी शक्ति से देवताओं को आतंकित कर रखा था। उसकी शक्ति और क्रूरता से त्रस्त होकर देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे उसका संहार करें। शिवजी ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और अपनी दिव्य शक्ति से तारकासुर का वध कर दिया। यह देखकर देवताओं में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई, लेकिन इस घटना ने तारकासुर के तीन पुत्रों तारकक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली के हृदय में प्रतिशोध की ज्वाला जला दी।
वे तीनों ब्रह्माजी की कठोर तपस्या करने लगे, जिससे प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। तीनों ने अमरत्व का वरदान मांगा, लेकिन ब्रह्माजी ने इसे अस्वीकार कर दिया और कोई अन्य वरदान मांगने को कहा। तब तीनों भाइयों ने विचार किया और एक अत्यंत चतुराई भरा वरदान मांगा— तीनों के लिए अलग-अलग भव्य नगरों का निर्माण किया जाए, जो एक हजार वर्षों तक ब्रह्मांड में विचरण करें और हजारवें वर्ष में एक क्षण के लिए एक सीध में आ जाएं। साथ ही, उनकी मृत्यु केवल उसी योद्धा के हाथों संभव हो, जो एक ही बाण से इन तीनों नगरों को भस्म करने में सक्षम हो।
ब्रह्माजी के आशीर्वाद से मयदानव ने उनके लिए तीन अनुपम नगरों की रचना की— सोने का नगर तारकक्ष के लिए, चांदी का नगर कमलाक्ष के लिए, और लोहे का नगर विद्युन्माली के लिए। इन नगरों को त्रिपुर कहा गया, और इन त्रिपुरों के बल पर तीनों असुरों ने स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल पर अपना अधिपत्य जमा लिया। उनका आतंक इतना बढ़ गया कि स्वयं इंद्र भी भयभीत होकर भगवान शिव की शरण में पहुंचे।
भगवान शिव ने असुरों का अंत करने के लिए एक दिव्य रथ का निर्माण कराया, जिसकी प्रत्येक वस्तु किसी न किसी देवता के तेज से बनी थी— चंद्रमा और सूर्य से रथ के पहिए, इंद्र, वरुण, यम और कुबेर से रथ के चार घोड़े, हिमालय से धनुष, शेषनाग से प्रत्यंचा, और स्वयं भगवान शिव बाण बने, जिसकी नोंक पर अग्निदेव विराजमान हुए। इस अद्भुत रथ पर आरूढ़ होकर भगवान शिव युद्ध के लिए निकले।
युद्ध अत्यंत भयंकर था। देवता और असुर अपनी पूरी शक्ति से लड़ रहे थे। तभी वह क्षण आया, जिसका देवताओं को बेसब्री से इंतजार था— जब तीनों नगर एक ही सीध में आ गए। जैसे ही यह संयोग बना, भगवान शिव ने अपने दिव्य बाण का संधान किया और देखते ही देखते तीनों नगरों को भस्म कर दिया।
इस महायुद्ध के बाद, भगवान शिव को “त्रिपुरारी” की उपाधि मिली, अर्थात त्रिपुर का विनाश करने वाले भगवान। यह कथा इस बात का प्रतीक है कि अहंकार और अधर्म कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः सत्य और धर्म की विजय होती ही है।
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कार्तिक पूर्णिमा का महत्व क्या है? | Kartik Purnima Ka Mahatva Kya Hai?
- धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व: कार्तिक पूर्णिमा (Kartik Purnima) को हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस दिन गंगा, यमुना, नर्मदा और अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलती है। इसे त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध किया था।
- दान-पुण्य और व्रत का महत्व: कार्तिक पूर्णिमा पर दान, व्रत और पूजा करने से हजार गुना अधिक फल प्राप्त होता है। इस दिन दीपदान, अन्नदान और वस्त्रदान का विशेष महत्व है। लोग जरूरतमंदों की सहायता कर पुण्य अर्जित करते हैं और अपनी आत्मा को शुद्ध करने का प्रयास करते हैं।
- गुरुनानक जयंती का महत्व: कार्तिक पूर्णिमा के दिन सिख धर्म के प्रथम गुरु, गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ था, इसलिए इसे सिख समुदाय में भी विशेष स्थान प्राप्त है। इस अवसर पर गुरुद्वारों में कीर्तन, लंगर और प्रकाश उत्सव का आयोजन किया जाता है, जिससे आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।
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Conclusion
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FAQ’s
Q. कार्तिक पूर्णिमा को अन्य किन नामों से जाना जाता है?
Ans. कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा और देव दीपावली के नाम से भी जाना जाता है।
Q. कार्तिक पूर्णिमा 2025 कब मनाई जाएगी?
Ans. कार्तिक पूर्णिमा 2025 को 5 नवंबर को मनाई जाएगी।
Q. कार्तिक पूर्णिमा के दिन कौन-कौन से धार्मिक कार्य किए जाते हैं?
Ans. इस दिन गंगा स्नान, दीपदान, दान-पुण्य, व्रत, और भगवान विष्णु व शिव की पूजा की जाती है।
Q. इस दिन को देव दीपावली क्यों कहा जाता है?
Ans. मान्यता है कि इस दिन देवता स्वर्ग से आकर गंगा स्नान करते हैं, इसलिए इसे देव दीपावली कहा जाता है।
Q. त्रिपुरी पूर्णिमा का पौराणिक महत्व क्या है?
Ans. इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर राक्षस का वध किया था, जिससे धर्म की विजय हुई थी।
Q. कार्तिक पूर्णिमा के दिन दान-पुण्य का क्या महत्व है?
Ans. इस दिन दान करने से हजार गुना अधिक पुण्य प्राप्त होता है और पापों का नाश होता है।