
देव दीपावली 2025: शुभ मुहूर्त, महत्व व इतिहास Dev Deepavali 2025 : (Shubh Muhurat, Mahatva Aur Itihas): हिंदू धर्म में देव दीपावली (Dev Diwali) एक अत्यंत शुभ और पवित्र पर्व माना जाता है। यह दिवाली के पंद्रह दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है और इसे “देवताओं की दिवाली” के रूप में जाना जाता है। वाराणसी में इस दिन गंगा घाटों पर दीपों की अद्भुत छटा बिखरती है, जिसे देखने के लिए हजारों श्रद्धालु यहाँ एकत्र होते हैं। क्या आप जानते हैं कि देव दीपावली का पौराणिक महत्व क्या है? इस दिन क्यों माना जाता है कि देवता स्वयं धरती पर उतरकर गंगा स्नान करते हैं? और यह पर्व भगवान शिव और विष्णु की आराधना के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
यदि आप देव दीपावली 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त के बारे में जानना चाहते हैं, Dev Deepawali 2025 तो आपको इसके धार्मिक आधार और परंपराओं को समझना आवश्यक होगा। इस दिन गंगा स्नान, दीपदान और दान-पुण्य करने से व्यक्ति को क्या लाभ होते हैं? क्या सही विधि से इस पावन पर्व को मनाने से जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिल सकती है? यदि आप भी इस दिव्य अवसर पर पुण्य अर्जित करना चाहते हैं और अपने जीवन में सुख-समृद्धि एवं आध्यात्मिक शांति प्राप्त करना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक अवश्य पढ़ें।
इस लेख में हम आपको देव दीपावली 2025 की सम्पूर्ण जानकारी देंगे—इसकी तिथि, शुभ मुहूर्त, पौराणिक महत्व और इस दिन किए जाने वाले धार्मिक कार्यों के बारे में विस्तार से बताएंगे…
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देव दीपावली क्या है? | Dev Deepavali Kya Hai?

देव दीपावली (Dev Deepawali) हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे “देवताओं की दिवाली” कहा जाता है। यह दिवाली के पंद्रह दिन बाद, कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाती है। मान्यता है कि इस दिन देवता स्वयं धरती पर आकर गंगा स्नान करते हैं और दीप जलाकर भगवान शिव की आराधना करते हैं। विशेष रूप से वाराणसी के गंगा घाटों पर इस अवसर पर भव्य दीपोत्सव मनाया जाता है, जहां लाखों दीप जलाकर गंगा माता की आरती की जाती है। इसे भगवान शिव की विजय का प्रतीक माना जाता है, जब उन्होंने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था। इस दिन गंगा स्नान, दीपदान और दान-पुण्य करने से व्यक्ति को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। श्रद्धालु इस पर्व को भक्ति, उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाते हैं।
देव दीपावली 2025 कब है? | Dev Deepavali 2025 Kab Hai?
देव दीपावली (Dev Deepawali) आमतौर पर दिवाली के 15 दिन बाद, कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाती है। 2025 में यह पर्व 5 नवंबर, बुधवार को मनाया जाएगा। पूर्णिमा तिथि 4 नवंबर 2025 को रात 9:06 बजे शुरू होकर 5 नवंबर 2025 को शाम 5:18 बजे समाप्त होगी। इस दिन गंगा स्नान, दीपदान और भगवान शिव की पूजा विशेष रूप से की जाती है।
देव दीपावली 2025 का शुभ मुहूर्त क्या है? | Dev Deepavali 2025 Ka Shubh Muhurat Kya Hai?
S.NO | विवरण | समय |
1 | कार्तिक पूर्णिमा | 5 नवंबर (पूरा दिन) |
2 | कार्तिक पूर्णिमा प्रारंभ | 4 नवंबर रात्रि 10:36 बजे |
3 | कार्तिक पूर्णिमा समाप्त | 5 नवंबर शाम 6:48 बजे |
देव दीपावली की पूजा विधि क्या है? | Dev Deepavali Ki Puja Vidhi Kya Hai?
- स्नान और संकल्प: देव दीपावली (Dev Deepavali) के दिन प्रातः गंगा स्नान या घर पर पवित्र स्नान करना शुभ माना जाता है। इसके बाद व्रत और पूजा का संकल्प लें। संकल्प लेते समय भगवान विष्णु, शिव और अन्य देवताओं का ध्यान करें तथा दीपदान करने का संकल्प करें।
- मंडप और दीप सज्जा: शाम के समय घर, मंदिर और गंगा घाटों पर दीप जलाकर देवताओं का स्वागत किया जाता है। दीपों को घी या तेल से प्रज्वलित कर विभिन्न स्थानों पर रखा जाता है। विशेष रूप से तुलसी के पौधे, घर के मुख्य द्वार और पूजा स्थल पर दीप जलाना शुभ होता है।
- भगवान शिव और विष्णु की पूजा: इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है। भगवान शिव का जल, दूध, बिल्वपत्र आदि से अभिषेक किया जाता है और भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराकर तुलसी पत्र अर्पित किया जाता है। इसके बाद आरती की जाती है।
- दीपदान अनुष्ठान: देव दीपावली पर गंगा नदी, अन्य पवित्र नदियों या घर में दीपदान किया जाता है। श्रद्धालु दीप प्रवाह कर देवताओं को समर्पित करते हैं। मान्यता है कि इस दिन दीपदान करने से पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
- मंत्र जाप और कथा वाचन: इस दिन भगवान शिव, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के मंत्रों का जाप किया जाता है। साथ ही देव दीपावली की कथा का वाचन या श्रवण किया जाता है। कथा सुनने से पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
- भोग और प्रसाद वितरण: पूजा के अंत में भगवान को नैवेद्य अर्पित किया जाता है, जिसमें मिठाई, फल और पंचामृत शामिल होते हैं। पूजा संपन्न होने के बाद दीपों की आरती की जाती है और प्रसाद भक्तों में वितरित किया जाता है, जिससे सभी को पुण्य लाभ प्राप्त होता है।
देव दीपावली की पौराणिक कथा क्या है? | Dev Deepavali ki Pauranik katha kya Hai?
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव (Bhagwan Shiv) Dev Deepavali के पुत्र स्वामी कार्तिकेय को देवताओं का सेनापति नियुक्त किया गया, जिन्होंने महादानव तारकासुर (Tarkasur) का वध किया। अपने पिता के संहार का प्रतिशोध लेने के लिए तारकासुर के तीन पुत्र—तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली—सघन तपस्या में लीन हो गए। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए, लेकिन अमरत्व का वरदान देने से इनकार कर दिया। तब त्रिपुरासुर नाम से प्रसिद्ध हुए इन तीनों ने एक चतुराई भरा वरदान मांगा—जब उनकी तीनों पुरियां अभिजित नक्षत्र में एक सीध में आ जाएं और कोई असंभव रथ पर सवार होकर, असंभव बाण से प्रहार करे, तभी उनकी मृत्यु संभव हो। ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह दिया, और इस अद्वितीय वरदान से शक्ति पाकर त्रिपुरासुर तीनों लोकों में आतंक मचाने लगे।
जब उनका अत्याचार असहनीय हो गया, तो देवताओं ने भगवान शिव की शरण ली। शिव जी ने त्रिपुरासुर का अंत करने का संकल्प लिया और एक दिव्य रथ का निर्माण किया—जिसमें पृथ्वी रथ बनी, सूर्य और चंद्रमा पहिए बने, स्वयं सृष्टि सारथी बने, वासुकी नाग धनुष की डोर बने, और मेरु पर्वत धनुष बना। भगवान विष्णु स्वयं बाण स्वरूप में स्थापित हुए। जैसे ही अभिजित नक्षत्र में तीनों पुरियां एक सीध में आईं, भगवान शिव ने अपने दिव्य धनुष से त्रिपुरासुर पर प्रहार किया। उनका निशाना अचूक था—तीनों नगर तुरंत जलकर भस्म हो गए, और त्रिपुरासुर का अंत हो गया। इस महान विजय के पश्चात शिव जी त्रिपुरारी के नाम से प्रसिद्ध हुए।
त्रिपुरासुर (Tripurasur) के वध की इस शुभ तिथि पर, देवताओं ने आनंदोत्सव मनाया। उन्होंने काशी नगरी में आकर दीप जलाए और भगवान शिव की महिमा का गुणगान किया। तभी से कार्तिक पूर्णिमा के इस पावन दिन को देव दीपावली के रूप में मनाया जाने लगा, क्योंकि यह वही दिन था जब स्वयं देवताओं ने पृथ्वी पर आकर दिवाली मनाई थी।
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देव दीपावली का पौराणिक महत्व क्या है? | Dev Deepawali Ka Pauranik Mahatva Kya Hai?
- त्रिपुरासुर वध की विजय: देव दीपावली (Dev Deepawali) भगवान शिव (Bhagwan Shiv) द्वारा त्रिपुरासुर के वध की विजय का प्रतीक है। इस दिन शिवजी ने तीनों राक्षस पुत्रों का संहार कर धर्म की स्थापना की थी, जिसे देवताओं ने काशी में दीप जलाकर उत्सव के रूप में मनाया।
- पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति: कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान, दीपदान और दान-पुण्य करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इस दिन किया गया सत्कर्म जीवन में शुभता लाता है और मोक्ष की ओर मार्ग प्रशस्त करता है।
- काशी की भव्यता और आध्यात्मिक ऊर्जा: देव दीपावली के दिन वाराणसी (Varanasi) के घाट हजारों दीपों से रोशन होते हैं, जिससे आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था को प्रकट करता है, बल्कि काशी की सांस्कृतिक भव्यता को भी दर्शाता है।
Conclusion:-Dev Deepavali 2025
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FAQ’s:-Dev Deepavali 2025
Q. देव दीपावली कब मनाई जाती है?
Ans. देव दीपावली कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है, जो दिवाली के 15 दिन बाद आती है। 2025 में यह पर्व 5 नवंबर को मनाया जाएगा।
Q. देव दीपावली को “देवताओं की दिवाली” क्यों कहा जाता है?
Ans. मान्यता है कि त्रिपुरासुर वध की खुशी में देवताओं ने काशी में दीप जलाकर उत्सव मनाया, इसलिए इसे “देवताओं की दिवाली” कहा जाता है।
Q. देव दीपावली का मुख्य आयोजन कहां होता है?
Ans. देव दीपावली का सबसे भव्य आयोजन वाराणसी के गंगा घाटों पर होता है, जहां लाखों दीप जलाए जाते हैं और गंगा आरती की जाती है।
Q. त्रिपुरासुर कौन थे?
Ans. त्रिपुरासुर तीन राक्षस थे तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली जिन्हें भगवान शिव ने अभिजित नक्षत्र में विशेष बाण से नष्ट किया था।
Q. देव दीपावली पर कौन-कौन से धार्मिक कार्य किए जाते हैं?
Ans. इस दिन गंगा स्नान, दीपदान, भगवान शिव और विष्णु की पूजा, मंत्र जाप, कथा वाचन और दान-पुण्य किया जाता है।
Q. देव दीपावली से जुड़ी प्रमुख पौराणिक कथा क्या है?
Ans. देव दीपावली त्रिपुरासुर वध से जुड़ी है, जब भगवान शिव ने तीनों राक्षसों का संहार कर धर्म की पुनः स्थापना की थी।